Friday, January 21, 2022
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पिथौरागढ़ में बादल फटने से तीन की मौत, भूस्खलन में दो गांव दबने से 11 लापता

पिथौरागढ़। रविवार देर रात से हो रही भारी बारिश से पिथौरागढ़ के मुन्स्यारी और बंगापानी तहसीलों में व्यापक तबाही हुई है। मुख्यमंत्री ने जिला प्रशासन को राहत कार्यों में किसी तरह की कोताही न बरतने के निर्देश दिए हैं। भूस्खलन की वजह से घरों के गिरने से तीन लोगों की मौत हो गई और पांच लोग घायल हो गए। वहीं दो गांवों के मलबे में दबने से 11 लोग लापता हैं। राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (एसडीआरएफ) की दो टीमें मौके पर हैं, लेकिन जिला प्रशासन ने एक और टीम की मांग की है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने तत्काल ही तीसरी टीम भेजने के निर्देश दिए हैं। पुलिस भी मौके पर राहत कार्यों में मदद कर रही है। सोमवार तड़के करीब तीन बजे गैला गांव में वर्षा से दो घर गिर गए, जिससे शेरसिंह, गोविंदी देवी और मानता की मौत हो गई, जबकि दीदार सिंह, रुक्मणी देवी, प्रियंका, शीला और मनकू घायल हो गए। वहीं तांगा मुन्यानी में दो गांव भूस्खलन में दब गए, जिसमें 11 लोग लापता हैं। उनकी तलाश की जा रही है, लेकिन बारिश इसमें बाधा डाल रही है। रविवार की रात मुन्स्यारी में 84 मिलीमीटर व धारचूला में 149 मिलीमीटर बारिश हुई है। रास्ता खराब होने से इन गांवों तक पहुंचने में भी दिक्कत हो रही है।

हरख से डरे त्रिवेंद्र के पलायन से भाजपा की पेशानी पर आया पसीना

देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का चुनाव न लड़ने का फैसला चौंकाने वाला लगता जरूर है, लेकिन असल में डोईवाला में उनकी हार तय थी, इसीलिए वह मैदान छोड़कर भाग गए। त्रिवेंद्र का चुनाव से भागना भाजपा के लिए भी अच्छा संकेत नहीं है। चार साल तक प्रदेश की बागडोर संभालने वाला नेता ही अगर चुनाव से डर रहा हो तो साफ है कि बाकी इलाकों में क्या हाल होगा? हालांकि त्रिवेंद्र का दंभी स्वभाव ही उनके खिलाफ जा रहा है। सरकार के मुखिया के रूप में उन्होंने जमकर मनमानी की और किसी भी सहयोगी की सलाह नहीं मानी। प्रधानमंत्री मोदी की तर्ज पर वह सिर्फ शीर्ष से ही शासन चलाना चाहते थे, लेकिन मोदी की व्यक्तिगत छवि और कार्यकुशलता शायद उन्हें नजर नहीं अाई। केंद्र सरकार मेंं फैसले चाहे शीर्ष से ही क्यों न होते हों, लेकिन गडकरी जैसे मंत्रियों को काम करने की पूरी छूट है।

त्रिवेंद्र के पलायन करने से साफ हो गया है कि भाजपा के चार साल के शासन में कुछ भी अच्छा नहीं हुआ। जब मुख्यमंत्री रहा व्यक्ति अपने क्षेत्र में ही ऐसा काम नहीं करा सका कि चुनाव में उसकी जीत की गारंटी हो तो बाकी हलकों में क्या हुआ होगा यह आसानी से समझ में आता है। त्रिवेंद्र की जातिवादी मानसिकता ने भी उनके खिलाफ माहौल बनाने में मदद की। उनके चारों ओर जमा एक खास वर्ग के चाटुकारों का आज कोई पता नहीं है। जिन हरख सिंह रावत को त्रिवेंद्र ने अपने कार्यकाल में कोई तवज्जों नहीं दी अब उनसे डरकार भागना बताता है कि त्रिवेंद्र को भाजपा में आनन-फानन में क्यों हटाया। यही नहीं, अभी तक हरख को किसी पार्टी में एंट्री भी नहीं मिली है और उन्होंने त्रिवेंद्र के पांव उखाड़ दिए, इससे पता चलता है कि तमाम कमियों के बावजूद हरख का जनसर्मथन त्रिवेंद्र से अधिक है। त्रिवेंद्र का यह फैसला कहीं उनकी राजनीतिक पारी का अंत तो नहीं कर देगा या फिर त्रिवेंद्र को ऐसा लगता है कि इस चुनाव में भाजपा की संभावना कमजोर है, इसलिए अगली बार पूरी ताकत से मुकाबले में उतरा जाए। लेकिन, पलायनवादी नेता को भविष्य में भाजपा और जनता कितना महत्व देगी, यह देखना दिलचस्प होगा।    

पुरोला : सत्ता पाने वाली पार्टी का विधायक नहीं जीतता यहां से, निर्दलीय पाते हैं अच्छे वोट

देहरादून। सीटों के क्रम के आधार पर उत्तराखंड में पहले नंबर की सीट पुरोला है। यहां पर 2017 में कांग्रेस के टिकट पर राजकुमार विधायक बने थे, लेकिन वह हाल ही में भाजपा में शामिल हो गए हैं। इस सीट पर 2007 में कांग्रेस के राजेश जुवांठा व 2012 भाजपा के मालचंद विजयी रहे। यदि हम इन रुझानों को देखें तो पिछले 15 सालों से इस सुरक्षित सीट का परिणाम हमेशा ही राज्य में सत्ता पाने वाली पार्टी से अलग रहा। यानी जो पार्टी सत्ता में आई, उसके प्रत्याशी को पुरोला में हार मिली। 2007 में भाजपा सत्ता में आई तो कांग्रेस को पुरोला में जीत मिली, 2012 में कांग्रेस की सरकार बनी और पुरोला से भाजपा के मालचंद जीते, 2017 में भाजपा की फिर वापसी हुई तो यहां पर कांग्रेस के राजकुमार विजयी रहे।

इस सीट की एक खूबी यह है कि यहां पर निर्दलीय उम्मीदवारों को भी भरपूर समर्थन मिलता रहा है। 2007 में मालचंद ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर 14942 मत हासिल किए और दूसरे स्थान पर रहे। विजयी रहे कांग्रेस के राजेश जुवांठा उनसे सिर्फ 525 वोट ही अधिक ले सके। जुवांठा को 15467 मत मिले। 2012 में राजकुमार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े और वे तत्कालीन विधायक जुवांठा से करीब चार हजार वोट अधिक लेकर दूसरे नंबर पर रहे। 2017 में राजकुमार कांग्रेस में चले गए और पहली बार इस सीट पर भाजपा कांग्रेस में सीधी टक्कर रही, जिसे कांग्र्रेस ने करीब एक हजार मतों से जीत लिया। मालचंद दूसरे स्थान पर रहे। इस बार निर्दलीय के रूप में दुर्गेश्वर लाल तीसरे स्थान पर रहे और उन्हें 13508 मत मिले, जबकि राजकुमार को 17798 मत मिले।

इस बार इस सीट नए समीकरण उभरने की पूरी संभावना है। पहले नंबर पर रहे राजकुमार और दूसरे नंबर पर रहे मालचंद दोनों ही भाजपा से टिकट के दावेदार हैं। अब सवाल यह है कि भाजपा इन दोनों में से किसी एक को टिकट देगी या फिर नया प्रत्याशी उतारेगी। कांग्रेस के पास सभी विकल्प खुले हैं, लेकिन भाजपा में चुनाव से पहले टिकट की लड़ाई कोई गुल तो खिलाएगी। पार्टी के भीतरी सूत्रों का कहना है कि राजकुमार लेकर पार्टी ने अपने पांव पर ही कुल्हाड़ी मारने का काम किया है। पुरोला में विकास कार्य न होना भी बड़ा मुद्दा है।

क्या है भाजपा में साठ पार का मतलब

देहरादून। राजनीति में द्विअर्थी बातों का बड़ा महत्व है। इसी वजह से अक्सर विवाद होने पर नेताजी कहते हैं कि आप जो समझ रहें हैं न मेरे कहने का वह अर्थ नहीं था। अब भाजपा के एक ऐसे ही द्विअर्थी नारे ने पूरी पार्टी में कहीं खुशी, कहीं गम की स्थिति उत्पन्न कर दी है। भाजपा ने नारा दिया है, अबकी बार साठ पार। बस इस नारे को पार्टी के बुजुर्ग नेताओं ने अपने हित में मानते हुए ऐलान कर दिया है कि पार्टी इस बार साठ साल से अधिक के नेताओं को ही टिकट देगी, क्योंकि पार्टी में 75 पार वालों को टिहकट न देने का नियम है, इसलिए 75 का होने से पहले कुछ नेताओं को भाग्य चमकाने का मौका देने के लिए ही अबकी बार साठ पार का नारा दिया गया है। वहीं साठ साल से कम के नेता भी मान रहे हैं कि इस बार इस नारे की वजह से उन्हें तो मौका नहीं मिलने जा रहा। कई नेता तो इसे लेकर आपस में उलझ भी रहे हैं। उनका कहना है कि हम साठ से कम हैं, लेकिन हमारा आधार साठ वालों से कई ज्यादा है।

ऐसे ही कुछ नेताओं को जब हमने समझाया कि भाई अबकी बार साठ पार का मतलब साठ से अधिक उम्र के नेताओं को टिकट देना नहीं, बल्कि साठ से अधिक सीटें हासिल करना है तो उन्होंने इस पर भरोसा करने से ही इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि जब 2017 में कांग्रेस के खिलाफ बहुत ही तेज लहर थी तो भी हम साठ नहीं पा सके तो अब कैसे साठ से अधिक सीटें पा सकते हैं। दूसरे सरकार कुछ भी ऐसा नहीं कर सकी, जिससे यह कहा जाए कि लोग भाजपा को ही वोट देने के लिए आतुर हैं। हमने कहा कि सरकार ने उत्तर प्रदेश के साथ 21 सालों से लंबित संपत्ति विवाद निपटा दिए हैं, क्या यह बड़ी बात नहीं है तो एक नेताजी ने कहा कि भाई साहब अाप कुछ समझते भी हो। जरा बताओ कि कोई जमीन या भवन उत्तर प्रदेश के पास रहे या उत्तराखंड के, इससे आम लोगों की जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा। बस उस संपत्ति पर उत्तर प्रदेश शासन की जगह उत्तराखंड शासन का बोर्ड लग जाएगा। अब हमें भी यह तर्क समझ में आ गया कि बात तो सही है। फिर सरकार द्वारा पूरे राज्य में इस कथित उपलब्धि के होर्डिंग क्यों लगे हैं, हमें यह सवाल जरूर बेचैन करने लगा।

खैर हम फिर से अपनी बात को साबित करने के लिए मूल मुद्दे पर आ गए कि सरकार चारधाम रोड बना रही है, नेताजी तपाक से बोल उठे, भाई्र साहब चार धाम रोड पर वोट तो पिछली बार मिल गए थे, अब तो चार धाम रोड से हो रही दिक्कतों की चर्चा ज्यादा है। दूसरी बात, चार धाम का क्रेडिट किसी को मिलेगा तो वह प्रधानमंत्री मोदी हैं। राज्य सरकार को जो सड़कें बनानी थीं, उनकी तो हालत खराब है। राजधानी देहरादून सहित राज्य के सभी शहरों में सड़कों का हाल बुरा है। सीवर, पानी व नाली के लिए खुदी सड़के सालो से बनी नहीं हैं। यही नहीं शहीदों के नाम वाली सड़कों की तक सरकार सुध नहीं ले रही है। उदाहरण के लिए शहीद राजीव जुयाल मार्ग को ही ले लें। हम अागे कुछ बोलते, इससे पहले ही नेताजी बोल उठे, बिजली का हाल यह है कि आती कम जाती ज्यादा है। यहीं नहीं कभी तो ऐसी आती है कि ट्यूब भी नहीं जलती और कभी तमाम उपकरण फंूक देती है। महंगी भी कम नहीं है। जब केजरीवाल 300 यूनिट मुफ़त देने की बात कर रहे हैं, तो हमारी सरकार ऐसा क्यों नहीं करती। यहीं नहीं बिजली विभाग के भ्रष्ट अफसर व कर्मचारी जले पर नमक छिड़कने का काम करते रहते हैं। यह कहते हुए नेताजी ने आत्मावलोकन वाले अंदाज में जातिवाद से लेकर चमचों व बाहरी राज्यों के पैसे वालों को उपकृत करने की बात कहते हुए साबित कर दिया साठ पार सीटें तो आ नहीं सकतीं इसलिए अबकी बार साठ पार का मतलब साठ साल से अधिक के लोगों को टिकट देना ही है। अब तो हमें भी नेताजी की बात में दम दिखने लगा है, क्योंकि भाजपा के जिन विधायकों ने अबकी बार साठ पार के नारे से शहर की दीवारों को पोता है, उनकों भी अपने जीतने का भरोसा नहीं है। खैर देखते हैं कि आगे क्या होता है?        

हरदा और हरख में उज्याड़ू बल्द पर छिड़ी बहस, रावत से छिनेगा पंजाब का प्रभार

देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री हरख सिंह रावत के बीच पिछले कुछ समय से एक-दूसरे को उज्याड़ू बल्द (यानी वह बैल जो दूसरों की फसल तो उजाड़ता है, अपना खेत भी नहीं छोड़ता) साबित करने की होड़ लगी हुई है। पंजाब कांग्रेस के नाटक के बाद उत्तराखंड में हरख के समर्थक हरीश रावत यानी हरदा को उज्याड़ू बल्द कह रहे हैं। उनका कहना है कि हरीश रावत ने जिस नवजोत सिंह सिद्धू के दबाव में अमरिंदर सरकार को उजाड़ा और चरणजीत सिंह चन्नी की सरकार बनवाई, अब वही सिद्धू उसे चुनौती दे रहे हैं। उधर, इस पूरे प्रकरण में हरीश रावत की भूमिका से कांग्रेस नेतृत्व खुश नहीं और उसने हरीश रावत को पंजाब प्रभारी के पद से हटाने का मन बना लिया है। इसीलिए सिद्धू के इस्तीफे के बाद उपजे संकट से निपटने के लिए रावत को पंजाब नहीं भेजा गया। हालांकि, इसमें एक बात यह भी है कि रावत उत्तराखंड में अधिक समय देने के लिए खुद को पंजाब की जिम्मेदारी से मुक्त करने का पहले ही आग्रह कर चुके थे।

भाजपा के इस हमले पर हरदा ने प्रतिक्रिया देने में जरा भी देर नहीं की और ट्विटर पर लिखा कि भाजपा ने उज्याड़ू बल्दों का अस्तित्व स्वीकार किया। अब देखना यह है कि भाजपा अपने उज्याड़ू बल्दों के साथ क्या सुलूक करती है। जिन्होंने उत्तराखंड का ही उज्याड़ अभी-अभी भी जमकर के खाया है। रहा सवाल पंजाब से लौटे कथित उज्याड़ू बल्द का, यह तो भाजपा के दोस्तों तुम्हें चुनाव में पता चल जाएगा कि तुम पंजाब में किस कोठरी में जाने वाले हो। जो दूसरों के लिए अंधेरा खोजता है, नियति उसके लिए भी अंधेरे का इंतजाम करती है और समय कालचक्र ने पंजाब और उत्तराखंड में भाजपा के लिए अंधेरे का इंतजाम कर दिया है।

हरदा ने अपने इस ट्वीट में हरख सिंह रावत के उस बयान को लेकर भाजपा को चुनौती दी है, जिसमें हरख सिंह ने कहा था कि प्रदेश का नेतृत्व अयोग्य हाथों में है। असल में हरख सिंह ही वह नेता हैं, जिनकी वजह से 2016 में हरीश रावत की सरकार के लिए चुनौतियां पैदा हुई थीं। तब हरख सिंह ने हरदा की सरकार में मंत्री रहते हुए उनके खिलाफ मोर्चा खोला था। हरख बाद में भाजपा में आ गए और मंत्री बन गए, लेकिन पिछले डेढ़ साल से हरख सिंह भाजपा नेतृत्व को लगातार निशाने पर ले रहे हैं। त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यकाल में उनकी मुख्यमंत्री से लगातार तनातनी रही और त्रिवेंद्र ने भी उनको बराबर दरकिनार किए रखा। मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के चयन के समय भी हरख सिंह खुश नहीं थे, लेकिन चुनाव से पहले हरख के बदले सुरों ने भाजपा की पेशानी पर बल डाल दिए हैं। हालांकि भाजपा ने आक्रामक रुख की बजाय हरख को संतुष्ट करने की कोशिश की है। कुल मिलाकर उज्याड़ू बल्द साबित करने की हरदा और हरख की होड़ उत्तराखंड की राजनीति को रोचक बना रही है।

यूपी चुनाव के बाद खट्टर की विदाई तय

चंडीगढ़। उत्तराखंड, गुजरात और कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने के बाद अब हरियाणा, त्रिपुरा और मध्य प्रदेश में भी भाजपा ने नेतृत्व बदलने का मन बना लिया है। उत्तर प्रदेश चुनाव के ठीक बाद हरियाणा में मुख्यमंत्री मनोहर लाल की गद्दी का जाना तय है। हरियाणा के मामले में भी भाजपा किए नए नेता को ही कमान सौंपने के पक्ष में है। नई दिल्ली में पार्टी के सूत्रों के मुताबिक पार्टी ऐसे गैर जाट चेहरे को सामने लाना चाहती है, जो पूरे हरियाणा में स्वीकार्य हो और जिसे लेकर सहयोगी जजपा की ओर से भी कोई आपत्ति नहीं हो। बताया जाता है कि पिछले दिनों जजपा नेता और उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा से बातचीत में खट्टर के विकल्प पर चर्चा भी हुई है। वरिष्ठता के हिसाब से देखें तो अनिल विज विकल्प हो सकते हैं, लेकिन पार्टी ऐसे चेहरे को सामने लाना चाहती हो, जिसके भरोसे वह 2024 के चुनाव में उतर सके। इसलिए विज का नाम फिलहाल दौड़ से बाहर है और जिस तरह से तीन राज्यों में वरिष्ठता को नजरअंदाज किया गया है, उससे साफ हो गया है कि अब यह नेता चुनने का पैमाना नहीं हैं। भाजपा की कोशिश किसी तेज-तर्तार युवा नेता को कमान सौंपने की है, भले ही वह पहली बार का विधायक या सांसद ही क्यों न हो। अगर, जातीय आंकड़ों के हिसाब से देखें तो गैर-जाट नेताओं में भाजपा किसी वैश्य अथवा पंजाबी नेता पर ही दांव लगाना चाहेगी। वैश्य नेताओं में कमल गुप्ता, ज्ञानचंद गुप्ता और असीम गोयल प्रमुख हैं, लेकिन अगर लोकप्रियता और युवा होना भाजपा की प्राथमिकता हुई तो इनमें असीम गोयल पहले पायदान पर दिखते हैं। गोयल अंबाला से विधायक हैं और वे दूसरी बार अपने काम के दम पर ही चुने गए हैं। पार्टी से लंबे समय से जुड़े होने की वजह से वह मौजूदा मानदंडों पर पर भी फिट बैठते हैं। कमल गुप्ता और ज्ञानचंद गुप्ता के मामले में उनकी उम्र आड़े आ सकती है। लेकिन, अगर खट्टर की जगह किसी पंजाबी को ही मुख्यमंत्री बनाया गया तो उनकी जगह एक ही विकल्प सबसे दमदार नजर आता है और वह नाम है संजय भाटिया। भाटिया पानीपत के रहने वाले हैं और करनाल सीट से सांसद हैं। भाटिया लंबे समय तक संगठन व संघ से जुड़े रहे हैं और उनकी छवि भी अच्छी है, एेसे वह खट्टर का उत्तराधिकारी बनने के सबसे उपयुक्त हैं। भाजपा किसी जाट नेता पर दांव लगाने से फिलहाल बचेगी, क्योंकि यह सहयोग जेजेपी को पसंद नहीं आएगा। हालांकि, भाजपा नेतृत्व अब तक जिस तरह से चौंकाता रहा है, उसमें कोई नया नाम भी सामने आ सकता है, लेकिन यह तो तय है कि खट्टर की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। विधानसभा चुनाव के परिणामों से तो पहले ही साफ हो चुका था कि खट्टर एक जिताऊ नेता नहीं हैं और मुख्यमंत्री बनने के बाद से उन्होंने जिस तरह से कई मौकों पर एक दंभी नेता की तरह व्यवहार किया उसने उनकी छवि को और भी धूमिल किया। अब मुख्यमंत्री के चाटुकार भले ही नेतृत्व परिवर्तन की खबरों को नकारें, लेकिन दिल्ली दरबार में तय किए गए फैसले बदलते नहीं हैं, यह भाजपा में हर कोई जानता है।    

चुनाव से पहले बलूनी की समानांतर राजनीति के मायने

देहरादून। भाजपा चुनाव से पहले अपने शासन वाले राज्यों में लगातार प्रयोग कर रही है। उत्तराखंड में दो बार मुख्यमंत्री बदलने के बाद उसने कर्नाटक और गुजरात में भी कमान बदल दी। इन तीनों ही राज्यों में नेतृत्व अपेक्षाकृत नए लोगोंे के हाथों में सौंपा गया है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी विधायक से सीधे मुख्यमंत्री बने हैं, यह बात पार्टी के अनेक पुराने नेताओं को हजम नहीं हो पा रही है। लेकिन भाजपा के एक नेता ऐसे हैं, जो पिछले चार सालों से राज्य में सक्रिय हुए हैं, लेकिन पहले ही दिन से मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं और केंद्रीय स्तर पर अपनी पहुंच की वजह से हर मुख्यमंत्री के लिए किसी न किसी रूप में मुश्किलें पैदा करते रहते हैं। इस बार उन्होंने उत्तराखंड की राजनीति में खुद को सुप्रीम नेता के तौर पर दिखाने की कोशिश शुरू कर दी हैं। इसके लिए वह राज्य की राजनीति से जुड़े फैसले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री दोनों को ही दरकिनार करके ले रहे हैं। इसने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को बहुत ही असहज स्थिति में ला दिया है। पिछले दिनों दो नेता भाजपा में शामिल हुए हैं, लेकिन इन दोनों ही नेताओं को भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल बलूनी ने पार्टी में शामिल कराया। अपनी पहुंच को दिखाने के लिए बलूनी ने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और धर्मेंद्र प्रधान के माध्यम से इन नेताओं को पार्टी में शामिल कराया। बुधपार 8 सितंबर को धनोल्टी के निर्दलीय विधायक प्रीतम सिंह पंवार भाजपा में शामिल हुए। उन्हें बलूनी ने ईरानी के सामने भाजपा में शामिल कराया। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इस कार्यक्रम की सूचना प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मदन कौशिक व मुख्यमंत्री धामी को अाखिरी समय पर दी गई और कौशिक तो किसी तरह दिल्ली पहुंच कर कार्यक्रम में शामिल हो गए, लेकिन धामी नहीं पहुंच सके। रविवार को एक अन्य विधायक राजकुमार भाजपा में शामिल हुए। इन्हें भी बलूनी ने ही केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के समक्ष भाजपा मंे शामिल कराया। पुरोला के कांग्रेसी विधायक राजकुमार को भाजपा में शामिल करने से पहले स्थानीय स्तर पर न तो कोई चर्चा की गई और न ही राज्य नेतृत्व को विश्वास में लिया गया। भाजपा में यह एंट्री बलूनी ने प्रदेश के चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान के समक्ष कराई इसलिए मजबूरी में मुख्यमंत्री को इस कार्यक्रम में शामिल होना पड़ा।

चुनाव से पहले विपक्षी विधायकों को भाजपा में लाकर बलूनी यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी उत्तराखंड की राजनीति पर गहरी पकड़ है। जबकि हकीकत यह है कि जिन नेताओं को भाजपा में शामिल किया जा रहा है, इस बार उनकी खुद की जमीन खिसकी हुई है और वे किसी सहारे की तलाश में हैं। बार-बार दल बदलने वाले राजकुमार और प्रीतम सिंह पंवार के भाजपा में आने से पार्टी के स्थानीय नेताओं की प्रतिक्रिया भी अभी आनी बाकी है, क्योंकि जिन सीटों पर ये दोनों नेता दावा ठोंकने वाले हैं, वहां पर पिछले चार सालों से काम कर रहे भाजपाई इनका पुरजोर विरोध करेंगे। यह बात भाजपा के स्थानीय नेतृत्व को भी मालूम है, लेकिन अपने नंबर बनाने के चक्कर में बलूनी शायद जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर रहे हैं। बलूनी आने वाले दिनों में इस तरह के कुछ और भी प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन अब भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को ही सोचना है कि उसे बलूनी पर लगाम लगानी है या फिर उत्तराखंड में बलूनी की समानांतर राजनीति को जारी रखना है।  

उत्तराखंड के लहर दरोगा – मुफ्त टीके में भी निकाला कमाई का रास्ता

देहरादून। आपमें से बहुत से लोगों ने लहर दरोगा की कहानी सुनी होगी, लेकिन जिन लोगों ने नहीं सुनी उनके लिए एक बार फिर से सुना देते हैं। एक राजा का एक साला था। रानी को अपना भाई बहुत ही प्यारा था, इसलिए राजा को उसे अपने शासन में कोई न कोई ओहदा देना ही पड़ता था, लेकिन साला था एक नंबर का रिश्वतखोर। राजा जहां भी उसे लगाता, वह वहीं रिश्वतखोरी शुरू कर देता। परेशान होकर राजा ने एक तरकीब निकाली और साले से कहा कि वह आज से लहर दरोगा है और उसका काम समुद्र की लहरें गिनना है। वह रोज उठने वाली लहरों को गिनकर हर शाम राजा को रिपोर्ट देगा। साले ने तुरंत ही काम शुरू कर दिया और बंदरगाह पर एक टॉवर पर बैठ कर लहरें गिनने लगा। इसी बीच, देश-विदेश के जहाज माल लेकर तट की ओर आने लगे तो उसने सभी जहाजों को रोक दिया और कहा कि उसे लहरें गिनने का महत्वपूर्ण कार्य राजा की ओर से दिया गया है और अगर एक भी लहर इधर से उधर हुई तो जो भी ऐसा करेगा, उसे इसका खामियाजा भुगतना होगा। परेशान होकर जहाज वालों ने लहर दरोगा की मुट्ठी गर्म करनी शुरू कर दी और दरोगा ने उस काम से भी कमाई शुरू कर दी जिसके बारे में राजा ने सोचा था कि वहां उनका साला कुछ भी नहीं कर सकेगा।

यही हाल हमारे उत्तराखंड में भी है। राजा का तो एक ही साला था, लेकिन उत्तराखंड में तो हर जगह लहर दरोगा नजर आ जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर पूरे देश में कोरोना का मुफ्त टीकाकरण अभियान चल रहा है, लेकिन उत्तराखंड के लहर दरोगाओं ने इसमें भी कमाई का जरिया निकाल ही लिया। ग्रामीण इलाकों में ग्रामीण और कम पढ़े लिखे लोगों को इन्होंने अपना निशाना बनाया। अस्पताल के लहर दरोगाओं ने अनपढ़ लोगों से कोविन एप पर रजिस्ट्रेशन के नाम पर बीस रुपये और पर्ची के नाम पर 10 रुपये की उगाही कर दी, यानी हर टीके पर 30 रुपये की वसूली। ये लहर दरोगा टीका लगाने वाले उन सभी लोगों ेको एक खास जगह पर रजिस्ट्रेशन के लिए भेजते हैं, जिनकी इंटरनेट तक पहुंच नहीं है। ग्रामीण इलाकों के स्वास्थ्य केंद्रो पर यह धड़ल्ले से हो रहा है। इन्हीं स्वास्थ्य केंद्रों के बार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी व प्रधानमंत्री मोदी के चित्र वाला होर्डिंग भी लगा है, जिस पर लिखा है, धन्यवाद मोदी जी दुनिया के सबसे बड़े मुफ्त टीकाकरण अभियान के लिए। लेकिन लहर दरोगा की कहानी शायद धामी व मोदी को याद नहीं है। (लहर दरोगाओं का एक और किस्सा अगली किस्त में)  

भाजपा की सत्ता में वापसी की भविष्यवाणी से कांग्रेस व आप से अधिक बेचैनी भगवा पार्टी के छत्रपों में

देहरादून। एक न्यूज चैनल के सर्वे में अगले विधान सभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने की भविष्यवाणी ने कांग्र्रेस और उत्तराखंड में सरकार बनाने का ख्वाब बुन रही आप की नींद उड़ा दी है, लेकिन इन दलों से भी ज्यादा बेचैनी भाजपा के भीतर दिख रही है। न्यूज चैनल ने 70 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा को 44 से अधिक सीटें मिलने का अनुमान जताया है। अगर चैनल के अनुमानों को एक संकेत मानते हुए यह माना जाए कि भाजपा अगले चुनाव में 35 से अधिक सीटें जीतती है और सरकार बना लेती है तो यह पहला मौका होगा, जब उत्तराखंड में किसी पार्टी की लगातार दूसरी बार सरकार बनेगी और मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी उत्तराखंड के अकले ऐसे मुख्यमंत्री हो जाएंगे, जिनके सिर सत्तारूढ़ पार्टी को दोबारा सिंहासन पर काबिज करने का सेहरा बंधेगा। ऐसी स्थिति में भले ही भाजपा आज यह कहे कि वे किसी को सीएम प्रोजेक्ट करके चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन जीत के बाद धामी के सिर पर ताज रखना ही पड़ेगा। यही नहीं इस चुनाव में जीत धामी को उत्तराखंड का सबसे स्वीकार्य नेता भी बना देगी।

बस इन्हीं समीकरणों ने भाजपा के उन सभी नेताओं की नींद उड़ा दी है, जो भाजपा को बहुमत न मिलने की स्थिति में किसी तरह से अपनी अहमियत दिखाकर या दबाव बनाकर सत्ता के शीर्ष पर फिर से पहुंचना चाहते थे। इनमें कुछ नेता तो भाजपा को हारते हुए भी देखना चाहते थे, ताकि पांच साल के बाद नई परिस्थितियों में खुद को सत्ता की दौड़ में ला सकें, क्योंकि धामी के नेतृत्व में भाजपा की जीत का मतलब यह होगा कि अगले पांच साल तक धामी के हाथ में ही सत्ता रहेगी, अगर वह कोई गलती नहीं करते हैं। भाजपा की मौजूदा सरकार के वह तीसरे मुख्यमंत्री हैं और उन्होंने कुछ ही समय जिस तरह से सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश की है, उसने उन्हें सर्व स्वीकार्य बना दिया है। वे विकास के एजेंडे को आगे बढ़ाने के साथ ही नाराज लोगों को भी मनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे लोगों में अच्छा संकेत जा रहा है। वह त्रिवंेद्र सिंह रावत की तरह न तो जातिवादी हैं और न ही उनकी तरह दंभी।

उत्तराखंड में भाजपा में इस समय छह पूर्व मुख्यमंत्री हैं। इनमें बीसी खंडूरी अब राजनीति से संन्यास सा ले चुके हैं, भगत सिंह कोश्यारी महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं, लेकिन रमेश पोखरियाल निशंक और त्रिवेंद्र सिंह रावत राज्य में सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के लिए बेचैन हैं। हाल ही में हटाए गए तीरथ सिंह रावत व कांग्रेस के राज में सत्ता संभाल चुके विजय बहुगुणा खुलकर तो नहीं पर कहीं न कहीं मन में शीर्ष पद को फिर से पाने की लालसा पाले हुए हैं। एक अन्य नाम अनिल बलूनी का है, जिन्होंने पांच-छह साल पहले ही उत्तराखंड की राजनीति में दखल देना शुरू किया और अमित शाह से नजदीकियों की वजह से राज्य से राज्यसभा की सदस्यता को हासिल किया। वह मीडिया के कुछ मित्रों की नजदीकियों की वजह से गाहे बगाहे अपना नाम मुख्यमंत्री पद के लिए उछालते रहे, हालांकि उनकी राज्य में जमीनी पकड़ ना के बराबर है। बलूनी ने मीडिया मित्रों की कृपा से त्रिवेंद्र को चार साल तक कभी निष्कंटक राज नहीं करने दिया। बलूनी किसी न किसी रूप में त्रिवेंद्र की कुर्सी को हिलाते रहे या हिलता हुआ दिखाते रहे। लेकिन सच यह है कि तमाम साजिशों के बावजूद बलूनी कुछ नहीं पा सके।

अब अगर धामी के नेतृत्व में भाजपा दोबारा सत्ता में आती है तो इसका श्रेय तो उन्हें जाएगा ही और इन सभी नेताओं के अरमान धूल धूसरित हो जाएंगे। यह बेचैनी आज पार्टी के एक कार्यक्रम में सामने भी आ गई। जब एक विधायक और पार्टी के कुछ नेताओं में ख्ुलकर तू-तू-मैं-मैं हो गई। आने वाले समय में ऐसी घटनाएं और अधिक होंगे, क्योंकि ये नेता तो खुलकर सामने नहीं आएंगे, लेकिन अपने समर्थकों के जरिए अपनी बेचैनी को जाहिर करने का कोई मौका छोड़ेंगे भी नहीं। अब धामी को पार्टी के भीतर की साजिशों से सावधान रहने की कहीं अधिक जरूरत है। 2012 में खंडूरी का उदाहरण सबके सामने है, जब वह सीएम कंडीडेट होते हुए भी चुनाव हार गए थे।  

हरीश रावत को किस पर है तेजाबी स्याही से हमले का शक?

देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को यह डर क्यों सता रहा है कि कोई  स्याही में तेजाब मिलाकर फेंकने की साजिश कर रहा है? उत्तराखंड की राजनीति में इस सवाल ने हंगामा खड़ा कर दिया है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस साजिश के बारे में खुद रावत ने ट्वीट करके जानकारी दी है। इस बारे में हालांकि अभी तक कोई औपचारिक शिकायत  दर्ज नहीं की गई है, लेकिन एक पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा समय में उत्तराखंड के सबसे कदृदावर नेता द्वारा जिस तरह की आशंकाएं जताई जा रही हैं, उस पर राज्य सरकार को त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए।

हरीश रावत ने 2 सितंबर को एक ट्वीट करके कहा कि- अभी-अभी मुझे दो सूत्रों से सूचना मिली है, जो चिंताजनक है। राजनीति में प्रतिद्वंद्विता हो, स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता हो , वैचारिक प्रतिद्वंद्विता हो, कर्म करने की प्रतिद्वंद्विता हो, मगर यदि आप अपने राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी के ऊपर छात्रों को उकसा करके या कुछ लोगों को मोटिवेट करके, उनके जरिये स्याही में तेजाब मिलाकर, कांग्रेस के नेताओं की यात्रा में किसी एक व्यक्ति को चिन्हित करके फेंकना चाहेंगे तो ये उत्तराखंड की राजनीति के लिए कलंकपूर्ण अध्याय होगा और और यदि ऐसा होता है तो उस राजनीतिक दल का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कौन राजनीतिक दल है। तो इसलिए सूचना मिलते ही मैं इसको सभी, जिसमें प्रशासनिक एजेंसीज भी सम्मिलित हैं, पुलिस भी सम्मिलित है और राजनीतिक दल भी सम्मिलित हैं, उनके साथ साझा कर रहा हूं। मेरी मां पूर्णागिरि से प्रार्थना है कि ऐसा न हो, यह केवल एक आशंका मात्र हो और उसके आधार पर यह सूचना मुझ तक पहुंची हो, मगर यदि ऐसा प्रयास होता है ताे यह उत्तराखंड की राजनीति का बहुत ही दुखद अध्याय होगा, एक बड़ा ही निंदनीय प्रयास होगा।

रावत ने अपने ट्वीट में यह तो स्पष्ट नहीं किया कि यह तेजाबी हमला उन पर हो सकता है, लेकिन वह जिस तरह किसी नेता को निशाना बनाने की बात कह रहे हैं, उससे साफ है कि वह नेता खुद रावत हो सकते हैं, क्योंकि उत्तराखंड कांग्रेस में इस समय वहीं सबसे बड़े नेता हैं और प्रतिद्वंद्वियों के निशाने पर भी हैं। यही नहीं उन्होंने 2 सितंबर को भी एक ट्वीट में लड़ते लड़ते मर मिटने कह बात कही थी। एक दिन बाद ही इस दूसरे ट्वीट से साफ है कि कहीं कुछ तो गड़बड़ है। इस ट्वीट में रावत ने कहा था- #चंडीगढ़ में हूंँ, आज सुबह बहुत जल्दी आंख खुल गई थी। मन में बहुत सारे अच्छे और आशंकित करने वाले, दोनों भाव आये। कभी अपने साथ लोगों के द्वेष को देखकर मन करता है कि सब किस बात के लिये और फिर मैं तो राजनीति में वो सब प्राप्त कर चुका हूंँ जिस लायक में था। फिर मन में एक भाव आ रहा है, सभी लड़ाईयां चाहे वो राजनैतिक क्यों न हों, वो स्वयं सिद्धि के लिए नहीं होती हैं। सिद्धांत, पार्टी, समाज, देश, प्रांत कई तरीके के समर्पण मन में उभर करके आते हैं, कुछ लड़ाईयॉ उसके लिए भी लड़नी पड़ती हैं, चाहे उसको लड़ते-2 युद्ध भूमि में ही दम क्यों न निकल जाय! मेरे सामने भी पार्टी, पार्टी के सिद्धांत, पार्टी का नेतृत्व उत्तराखंड, उत्तराखंडियत, राज्य आंदोलन के मूल तत्वों की रक्षा आदि कई सवाल हैं। मैं जानता हूंँ कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल, मेरे ऊपर कई प्रकार के अत्याचार ढहाने की कोशिश करेगा, उसकी तैयारियां हो रही हैं, मुझे आभास है और पुख्ता आभास है, मगर ज्यों-2 ऐसा आभास बढ़ता जा रहा है, चुनाव में लड़ने की मेरी संकल्प शक्ति भी बढ़ती जा रही है। एक नहीं, कई निहित स्वार्थ जो अलग-अलग स्थानों पर विद्यमान हैं, मेरे राह को रोकने के लिए एकजुट हो रहे हैं। क्योंकि जिस तरीके का उत्तराखंड मैंने बनाने की कोशिश की है, वो बहुत सारे लोगों के राजनैतिक व आर्थिक स्वार्थों पर चोट करता है। एक रिटायर्ड नौकरशाह आजकल सत्तारूढ़ दल ही नहीं बल्कि तीन-तीन राजनैतिक दलों के लिये एक साथ राजनैतिक उघाई कर रहे हैं, खनन की उघाई भी बट रही है। उत्तराखंड में बहुत सारे लोगों के आर्थिक स्वार्थ जुड़े हुए हैं, उन लोगों को भी एकजुट करने का प्रयास हो रहा है ताकि वो कुछ मदद सत्तारूढ़ दल की करें और तो कुछ कद्दू कटेगा-बटेगा के सिद्धांत पर कुछ आवाजों को बंद करने के लिए उनमें बांट दें। यदि सत्तारूढ़ दल मुझे युद्ध भूमि में राजनैतिक अस्त्रों से प्रास्त करने के बाद अन्यान्य अस्त्रों की खोज में है तो दूसरी तरफ एक राजनैतिक दल किसान और कुछ राजनैतिक स्वार्थों के साथ राजनैतिक दुरासंधि हो रही है, कहीं-कहीं 22 नहीं तो 2027 की सुगबुगाहट भी हवाओं में है। मगर चंडीगढ़ का यह एकांत मुझे प्रेरित कर रहा है कि जितनी शक्ति बाकी बची है, उससे उत्तराखण्ड और उत्तराखंडियत की रक्षा व पार्टी की मजबूती के लिए जो मैं अपने व्यक्तिगत कष्ट, मान-अपमान और यातनाओं को झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए और जब मैं अपने भावों के स्पंदन को विराम दे रहा हूंँ तो राजनैतिक संघर्ष का संकल्प मेरे मन में और होकर मुझे प्रेरित कर रहा है।

“जय हिंद” 

राज्य कर्मचारियों और पेंशनरों को मिलेगा 28 प्रतिशत डीए

देहरादून । मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने आज विधानसभा सदन में राज्य कर्मचारियों के फ्रिज किये गये महंगाई भत्ते को बहाल करने कीघोषणा की है। मुख्यमंत्री ने कहा कि 11 प्रतिशत डीए वृद्धि से अब राज्य कर्मचारियों और पेंशनरों को कुल 28 प्रतिशत डीए मिलेगा।सितम्बर माह के वेतन में बढ़ा हुआ डीए मिलेगा। जबकि जुलाई व अगस्त माह का एरियर दिया जाएगा। इससे प्रदेश के लगभग 1 लाख60 हजार कर्मचारी और 1 लाख 50 हजार पेंशनर लाभान्वित होंगे। 

*पुलिस कर्मियों के ग्रेड पे पर गम्भीरता व संवेदनशीलता से कर रहे विचार*

*इसके लिए पहले से गठित है मंत्रिमण्डल उपसमिति*

पुलिस कर्मियों के ग्रेड पे पर मुख्यमंत्री ने कहा कि इस पर पहले ही मंत्रीमण्डल उपसमिति बनी हुई है। हम इस पर पूरी गम्भीरता औरसंवेदनशीलता से विचार कर रहे हैं।  मुख्यमंत्री ने कहा पुलिसकर्मी दिन रात अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा से करते हैं। राज्यसरकार, राज्य और पुलिस विभाग के हित में हर जरूरी निर्णय लेगी।