देहरादून। अगर मैं कहूं कि देहरादून में गेहूं से चाय बनाने की नई तकनीक बिकसित हुई है तो चौंकिएगा नहीं। मैं बिल्कुल सच कह रहा हूं। विश्वास नहीं हो रहा हो तो देहरादून में शिमला बायपास रोड पर स्थित हरबंशवाला में  टीडीसी इंडिया लिमिटेड द्वारा करीब डेढ़ साल पहले किए गए प्लांटेशन को देख लें। जिस फार्म पर चाय का नया प्लांटेशन किया जाना था वहां पर सैंकड़ों बीघा जमीन पर चाय का एक भी पौधा अब तक नहीं लगाया गया है, लेकिन गेहूं, चारा व अन्य फसलें जरूर उग रही हैं। इस बारे में उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड के अधिकारी कुछ भी कहने से बच रहे हैं।

देहरादून के चाय बागान पर लंबे समय से भू माफिया की नजर है। लेकिन अदालतों के हस्तक्षेप की वजह से उनकी मंशा पूरी नहीं हो पा रही है। इसीलिए अधिकारियों से मिलीभगत कर लगातार चाय बागानों की उपेक्षा कर चाय के पौधों को खत्म किया जा रहा है ताकि उस जमीन को अन्य कामों में इस्तेमाल किया जा सके। कोर्ट के दखल से अभी तक भूमाफिया की यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी है। न्यायालय से मिली फटकार के बाद सरकार ने पिछले साल हरबंशवाला की सैकड़ों एकड़ जमीन पर चाय के नए प्लांटेशन की घोषणा की और इसके लिए सरकारी मशीनों और धन का इस्तेमाल करके पूरे चाय बागान से पुराने पौधों और झाड़ियों को हटाया गया। यहां पर नया ट्यूबवेल भी लगाया गया। साथ ही टीडीसी इंडिया लिमिटेड की ओर से चाय के नए प्लांटेशन की घोषणा वाला बोर्ड भी लगा। जिससे साफ हो गया कि इस जमीन पर चाय की नई पौध लग रही है, लेकिन डेढ़ साल के बाद भी यहां पर कोई पौध नहीं लगी है और ठेके पर इस जमीन को खेती के लिए दिया जा रहा था। ऐसा लगता है कि कोर्ट की आंखों में धूल झोंकने के लिए ही यह बोर्ड दिखावे के लिए लगाया गया है। पिछले दिनों उत्तराखंड की नई सरकार के कृषि मंत्री गणेश जोशी ने जोरशोर से राज्य में चाय उत्पादन के आंकड़े पेश किए थे, लेकिन वह इस फार्म पर गेहूं से चाय बनाने की उप्लब्धि का जिक्र करना भूल गए। सवाल यह है कि जब चाय बागान में सिर्फ चाय ही उगनी है तो यह गेहूं किसने लगवाई और इसका पैसा किसकी जेब में जा रहा है। टी बोर्ड के अधिकारी इस चुप्पी साधे हुए हैं। देहारादून के चाय बागान बहुत पुराने हैं और ये देहारादून शहर के पर्यावरण के लिए बहुत ही जरूरी हैं। इन चाय बागानों की खूबसूरती पुराने लोगों से जानी जा सकती है। देहरादून के बागों की चाय की भी अपनी खास पहचान होती थी। यहां की ग्रीन टी बहुत ही प्रसिद्ध थी, लेकिन पिछले कुछ दशकों से इन बागों के चारों और रिहायशी कालोनियां बन गई हैं और ये बाग नगर निगम की सीमा में भी आ गए हैं। उसके बाद से इन बागों की जमीन को खुर्दबुर्द करके बेचने की कोशिशें जारी हैं। यही वजह है कि बागों के बाहर स्थित आसपास की जमीन को बेचते या खरीदते समय रजिस्ट्री में यह उल्लेख करना होता है कि बेची जाने वाली जमीन चाय बागान का हिस्सा नहीं है। अगर इस जमीन पर चाय उगाने की जगह अन्य काम होता रहा तो वह दिन दूर नहीं है, जब देहरादून के चाय बागान अतीत की बात हो जाएंगे।  

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