यूपी चुनाव के बाद खट्टर की विदाई तय

संजय भाटिया और असीम गोयल में से किसी की भी लग सकती है लॉटरी

चंडीगढ़। उत्तराखंड, गुजरात और कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने के बाद अब हरियाणा, त्रिपुरा और मध्य प्रदेश में भी भाजपा ने नेतृत्व बदलने का मन बना लिया है। उत्तर प्रदेश चुनाव के ठीक बाद हरियाणा में मुख्यमंत्री मनोहर लाल की गद्दी का जाना तय है। हरियाणा के मामले में भी भाजपा किए नए नेता को ही कमान सौंपने के पक्ष में है। नई दिल्ली में पार्टी के सूत्रों के मुताबिक पार्टी ऐसे गैर जाट चेहरे को सामने लाना चाहती है, जो पूरे हरियाणा में स्वीकार्य हो और जिसे लेकर सहयोगी जजपा की ओर से भी कोई आपत्ति नहीं हो। बताया जाता है कि पिछले दिनों जजपा नेता और उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा से बातचीत में खट्टर के विकल्प पर चर्चा भी हुई है। वरिष्ठता के हिसाब से देखें तो अनिल विज विकल्प हो सकते हैं, लेकिन पार्टी ऐसे चेहरे को सामने लाना चाहती हो, जिसके भरोसे वह 2024 के चुनाव में उतर सके। इसलिए विज का नाम फिलहाल दौड़ से बाहर है और जिस तरह से तीन राज्यों में वरिष्ठता को नजरअंदाज किया गया है, उससे साफ हो गया है कि अब यह नेता चुनने का पैमाना नहीं हैं। भाजपा की कोशिश किसी तेज-तर्तार युवा नेता को कमान सौंपने की है, भले ही वह पहली बार का विधायक या सांसद ही क्यों न हो। अगर, जातीय आंकड़ों के हिसाब से देखें तो गैर-जाट नेताओं में भाजपा किसी वैश्य अथवा पंजाबी नेता पर ही दांव लगाना चाहेगी। वैश्य नेताओं में कमल गुप्ता, ज्ञानचंद गुप्ता और असीम गोयल प्रमुख हैं, लेकिन अगर लोकप्रियता और युवा होना भाजपा की प्राथमिकता हुई तो इनमें असीम गोयल पहले पायदान पर दिखते हैं। गोयल अंबाला से विधायक हैं और वे दूसरी बार अपने काम के दम पर ही चुने गए हैं। पार्टी से लंबे समय से जुड़े होने की वजह से वह मौजूदा मानदंडों पर पर भी फिट बैठते हैं। कमल गुप्ता और ज्ञानचंद गुप्ता के मामले में उनकी उम्र आड़े आ सकती है। लेकिन, अगर खट्टर की जगह किसी पंजाबी को ही मुख्यमंत्री बनाया गया तो उनकी जगह एक ही विकल्प सबसे दमदार नजर आता है और वह नाम है संजय भाटिया। भाटिया पानीपत के रहने वाले हैं और करनाल सीट से सांसद हैं। भाटिया लंबे समय तक संगठन व संघ से जुड़े रहे हैं और उनकी छवि भी अच्छी है, एेसे वह खट्टर का उत्तराधिकारी बनने के सबसे उपयुक्त हैं। भाजपा किसी जाट नेता पर दांव लगाने से फिलहाल बचेगी, क्योंकि यह सहयोग जेजेपी को पसंद नहीं आएगा। हालांकि, भाजपा नेतृत्व अब तक जिस तरह से चौंकाता रहा है, उसमें कोई नया नाम भी सामने आ सकता है, लेकिन यह तो तय है कि खट्टर की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। विधानसभा चुनाव के परिणामों से तो पहले ही साफ हो चुका था कि खट्टर एक जिताऊ नेता नहीं हैं और मुख्यमंत्री बनने के बाद से उन्होंने जिस तरह से कई मौकों पर एक दंभी नेता की तरह व्यवहार किया उसने उनकी छवि को और भी धूमिल किया। अब मुख्यमंत्री के चाटुकार भले ही नेतृत्व परिवर्तन की खबरों को नकारें, लेकिन दिल्ली दरबार में तय किए गए फैसले बदलते नहीं हैं, यह भाजपा में हर कोई जानता है।    

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