चुनाव से पहले बलूनी की समानांतर राजनीति के मायने

उत्तराखंड के भाजपा नेतृत्व को दरकिनार कर दिल्ली से कर रहे राज्य की राजनीति में दखलंदाजी

देहरादून। भाजपा चुनाव से पहले अपने शासन वाले राज्यों में लगातार प्रयोग कर रही है। उत्तराखंड में दो बार मुख्यमंत्री बदलने के बाद उसने कर्नाटक और गुजरात में भी कमान बदल दी। इन तीनों ही राज्यों में नेतृत्व अपेक्षाकृत नए लोगोंे के हाथों में सौंपा गया है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी विधायक से सीधे मुख्यमंत्री बने हैं, यह बात पार्टी के अनेक पुराने नेताओं को हजम नहीं हो पा रही है। लेकिन भाजपा के एक नेता ऐसे हैं, जो पिछले चार सालों से राज्य में सक्रिय हुए हैं, लेकिन पहले ही दिन से मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं और केंद्रीय स्तर पर अपनी पहुंच की वजह से हर मुख्यमंत्री के लिए किसी न किसी रूप में मुश्किलें पैदा करते रहते हैं। इस बार उन्होंने उत्तराखंड की राजनीति में खुद को सुप्रीम नेता के तौर पर दिखाने की कोशिश शुरू कर दी हैं। इसके लिए वह राज्य की राजनीति से जुड़े फैसले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री दोनों को ही दरकिनार करके ले रहे हैं। इसने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को बहुत ही असहज स्थिति में ला दिया है। पिछले दिनों दो नेता भाजपा में शामिल हुए हैं, लेकिन इन दोनों ही नेताओं को भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल बलूनी ने पार्टी में शामिल कराया। अपनी पहुंच को दिखाने के लिए बलूनी ने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और धर्मेंद्र प्रधान के माध्यम से इन नेताओं को पार्टी में शामिल कराया। बुधपार 8 सितंबर को धनोल्टी के निर्दलीय विधायक प्रीतम सिंह पंवार भाजपा में शामिल हुए। उन्हें बलूनी ने ईरानी के सामने भाजपा में शामिल कराया। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इस कार्यक्रम की सूचना प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मदन कौशिक व मुख्यमंत्री धामी को अाखिरी समय पर दी गई और कौशिक तो किसी तरह दिल्ली पहुंच कर कार्यक्रम में शामिल हो गए, लेकिन धामी नहीं पहुंच सके। रविवार को एक अन्य विधायक राजकुमार भाजपा में शामिल हुए। इन्हें भी बलूनी ने ही केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के समक्ष भाजपा मंे शामिल कराया। पुरोला के कांग्रेसी विधायक राजकुमार को भाजपा में शामिल करने से पहले स्थानीय स्तर पर न तो कोई चर्चा की गई और न ही राज्य नेतृत्व को विश्वास में लिया गया। भाजपा में यह एंट्री बलूनी ने प्रदेश के चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान के समक्ष कराई इसलिए मजबूरी में मुख्यमंत्री को इस कार्यक्रम में शामिल होना पड़ा।

चुनाव से पहले विपक्षी विधायकों को भाजपा में लाकर बलूनी यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी उत्तराखंड की राजनीति पर गहरी पकड़ है। जबकि हकीकत यह है कि जिन नेताओं को भाजपा में शामिल किया जा रहा है, इस बार उनकी खुद की जमीन खिसकी हुई है और वे किसी सहारे की तलाश में हैं। बार-बार दल बदलने वाले राजकुमार और प्रीतम सिंह पंवार के भाजपा में आने से पार्टी के स्थानीय नेताओं की प्रतिक्रिया भी अभी आनी बाकी है, क्योंकि जिन सीटों पर ये दोनों नेता दावा ठोंकने वाले हैं, वहां पर पिछले चार सालों से काम कर रहे भाजपाई इनका पुरजोर विरोध करेंगे। यह बात भाजपा के स्थानीय नेतृत्व को भी मालूम है, लेकिन अपने नंबर बनाने के चक्कर में बलूनी शायद जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर रहे हैं। बलूनी आने वाले दिनों में इस तरह के कुछ और भी प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन अब भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को ही सोचना है कि उसे बलूनी पर लगाम लगानी है या फिर उत्तराखंड में बलूनी की समानांतर राजनीति को जारी रखना है।  

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