भाजपा की सत्ता में वापसी की भविष्यवाणी से कांग्रेस व आप से अधिक बेचैनी भगवा पार्टी के छत्रपों में

नेता की नाराजगी को समर्थक कर रहे जाहिर, पार्टी के कार्यक्रमों में आपस में ही भिड़ रहे विधायक व कार्यकर्ता

देहरादून। एक न्यूज चैनल के सर्वे में अगले विधान सभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने की भविष्यवाणी ने कांग्र्रेस और उत्तराखंड में सरकार बनाने का ख्वाब बुन रही आप की नींद उड़ा दी है, लेकिन इन दलों से भी ज्यादा बेचैनी भाजपा के भीतर दिख रही है। न्यूज चैनल ने 70 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा को 44 से अधिक सीटें मिलने का अनुमान जताया है। अगर चैनल के अनुमानों को एक संकेत मानते हुए यह माना जाए कि भाजपा अगले चुनाव में 35 से अधिक सीटें जीतती है और सरकार बना लेती है तो यह पहला मौका होगा, जब उत्तराखंड में किसी पार्टी की लगातार दूसरी बार सरकार बनेगी और मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी उत्तराखंड के अकले ऐसे मुख्यमंत्री हो जाएंगे, जिनके सिर सत्तारूढ़ पार्टी को दोबारा सिंहासन पर काबिज करने का सेहरा बंधेगा। ऐसी स्थिति में भले ही भाजपा आज यह कहे कि वे किसी को सीएम प्रोजेक्ट करके चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन जीत के बाद धामी के सिर पर ताज रखना ही पड़ेगा। यही नहीं इस चुनाव में जीत धामी को उत्तराखंड का सबसे स्वीकार्य नेता भी बना देगी।

बस इन्हीं समीकरणों ने भाजपा के उन सभी नेताओं की नींद उड़ा दी है, जो भाजपा को बहुमत न मिलने की स्थिति में किसी तरह से अपनी अहमियत दिखाकर या दबाव बनाकर सत्ता के शीर्ष पर फिर से पहुंचना चाहते थे। इनमें कुछ नेता तो भाजपा को हारते हुए भी देखना चाहते थे, ताकि पांच साल के बाद नई परिस्थितियों में खुद को सत्ता की दौड़ में ला सकें, क्योंकि धामी के नेतृत्व में भाजपा की जीत का मतलब यह होगा कि अगले पांच साल तक धामी के हाथ में ही सत्ता रहेगी, अगर वह कोई गलती नहीं करते हैं। भाजपा की मौजूदा सरकार के वह तीसरे मुख्यमंत्री हैं और उन्होंने कुछ ही समय जिस तरह से सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश की है, उसने उन्हें सर्व स्वीकार्य बना दिया है। वे विकास के एजेंडे को आगे बढ़ाने के साथ ही नाराज लोगों को भी मनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे लोगों में अच्छा संकेत जा रहा है। वह त्रिवंेद्र सिंह रावत की तरह न तो जातिवादी हैं और न ही उनकी तरह दंभी।

उत्तराखंड में भाजपा में इस समय छह पूर्व मुख्यमंत्री हैं। इनमें बीसी खंडूरी अब राजनीति से संन्यास सा ले चुके हैं, भगत सिंह कोश्यारी महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं, लेकिन रमेश पोखरियाल निशंक और त्रिवेंद्र सिंह रावत राज्य में सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के लिए बेचैन हैं। हाल ही में हटाए गए तीरथ सिंह रावत व कांग्रेस के राज में सत्ता संभाल चुके विजय बहुगुणा खुलकर तो नहीं पर कहीं न कहीं मन में शीर्ष पद को फिर से पाने की लालसा पाले हुए हैं। एक अन्य नाम अनिल बलूनी का है, जिन्होंने पांच-छह साल पहले ही उत्तराखंड की राजनीति में दखल देना शुरू किया और अमित शाह से नजदीकियों की वजह से राज्य से राज्यसभा की सदस्यता को हासिल किया। वह मीडिया के कुछ मित्रों की नजदीकियों की वजह से गाहे बगाहे अपना नाम मुख्यमंत्री पद के लिए उछालते रहे, हालांकि उनकी राज्य में जमीनी पकड़ ना के बराबर है। बलूनी ने मीडिया मित्रों की कृपा से त्रिवेंद्र को चार साल तक कभी निष्कंटक राज नहीं करने दिया। बलूनी किसी न किसी रूप में त्रिवेंद्र की कुर्सी को हिलाते रहे या हिलता हुआ दिखाते रहे। लेकिन सच यह है कि तमाम साजिशों के बावजूद बलूनी कुछ नहीं पा सके।

अब अगर धामी के नेतृत्व में भाजपा दोबारा सत्ता में आती है तो इसका श्रेय तो उन्हें जाएगा ही और इन सभी नेताओं के अरमान धूल धूसरित हो जाएंगे। यह बेचैनी आज पार्टी के एक कार्यक्रम में सामने भी आ गई। जब एक विधायक और पार्टी के कुछ नेताओं में ख्ुलकर तू-तू-मैं-मैं हो गई। आने वाले समय में ऐसी घटनाएं और अधिक होंगे, क्योंकि ये नेता तो खुलकर सामने नहीं आएंगे, लेकिन अपने समर्थकों के जरिए अपनी बेचैनी को जाहिर करने का कोई मौका छोड़ेंगे भी नहीं। अब धामी को पार्टी के भीतर की साजिशों से सावधान रहने की कहीं अधिक जरूरत है। 2012 में खंडूरी का उदाहरण सबके सामने है, जब वह सीएम कंडीडेट होते हुए भी चुनाव हार गए थे।  

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